दिल्ली-जयपुर नेशनल हाईवे के मध्य स्थित प्रागपुरा कस्बा आज भी सदियों पुरानी परंपराओं को पूरे उत्साह और आस्था के साथ निभा रहा है। लगभग तीस हजार की आबादी होने के बावजूद यहां वर्षों से फाल्गुन पूर्णिमा पर पूरे कस्बे में केवल एक ही स्थान पर होलिका दहन किया जाता है। यह परंपरा प्रागपुरा की सामाजिक एकता, सौहार्द और सामूहिक संस्कृति का जीवंत उदाहरण मानी जाती है।

आज के दौर में जहां परिवार तक बिखरते नजर आते हैं, वहीं प्रागपुरा का यह दृश्य समाज को एकजुट रहने का संदेश देता है। एक ही माता-पिता की संतानें बड़े होकर अलग-अलग घर बसा लेती हैं, कई बार बुजुर्ग माता-पिता अकेले रह जाते हैं, लेकिन ऐसे समय में पूरे कस्बे का एक मंच पर एकत्र होकर होलिका दहन करना भाईचारे की मिसाल पेश करता है।

इस वर्ष 3 मार्च को होलिका दहन का पर्व मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान ने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी और अहंकार व छल का प्रतीक होलिका अग्नि में भस्म हो गई थी। तभी से फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन कर बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश दिया जाता है। कई स्थानों पर इसे छोटी होली भी कहा जाता है।
एडवोकेट देवांश सिंह ने कहा कि प्रागपुरा की यह परंपरा सामाजिक समरसता की मिसाल है। यह हमें याद दिलाती है कि त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का माध्यम होते हैं।
पूर्व जिला पार्षद ललित गोयल ने इसे क्षेत्र की गौरवशाली विरासत बताते हुए कहा कि तीस हजार की आबादी के बावजूद एक ही स्थान पर होलिका दहन करना आपसी विश्वास और सामूहिक संस्कृति का प्रतीक है।
पूर्व सरपंच एलन स्वामी ने कहा कि यह परंपरा नई पीढ़ी को एकता, भाईचारे और धार्मिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य करती है। सभी समाज और वर्ग के लोग मिलकर इस आयोजन को सफल बनाते हैं, जो सामाजिक सद्भाव को मजबूत करता है।
कांग्रेस नेता अजय सैनी ने कहा कि प्रागपुरा की यह अनूठी परंपरा पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा है। यह हमें सिखाती है कि भले ही जीवन के रास्ते अलग हों, लेकिन त्योहारों के अवसर पर हम सब एक हैं।
प्रागपुरा में एक ही होलिका दहन की परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि समाज की मजबूती एकता में ही निहित है। यहां होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने वाला महापर्व बनकर सामने आती है।



