पांडवों की आस्था से जुड़ा सरुंड का सारंग माता धाम, नवरात्र में लगता है भक्तों का मेला

आस्था, लोककथाओं और प्राचीन धार्मिक परंपराओं की अनूठी पहचान है सरुंड गांव की पहाड़ी पर स्थित श्री सारंग माता मंदिर। कोटपूतली कस्बे से लगभग सात किलोमीटर दूर अरावली की पहाड़ियों में स्थित यह धाम वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। करीब 650 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजमान माता के दर्शन के लिए भक्त सीढ़ियां चढ़ते हुए सात दरवाजों से गुजरकर मंदिर तक पहुंचते हैं।

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स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान यहां देवी माता की स्थापना कर पूजा-अर्चना की थी। मंदिर में चिलाय देवी के स्वरूप की पूजा होती है, जिन्हें श्रद्धालु सारंग माता के नाम से जानते हैं। मां दुर्गा के इस स्वरूप को काली और महाकाली से भी जोड़ा जाता है। ग्रामीण मानते हैं कि माता के नाम से ही सरुंड गांव की पहचान बनी।

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मंदिर की प्राचीनता करीब 5500 वर्ष मानी जाती है, हालांकि यह अवधि स्थानीय मान्यताओं पर आधारित है। इतिहास और लोकपरंपराओं में मंदिर के जीर्णोद्धार का संबंध तंवरावाटी के राजपूत शासकों से बताया जाता है। तंवर राजपूतों के अलावा गुर्जर समाज के कसाना गोत्र और खंडेलवाल समाज के अनेक परिवार भी माता की कुलदेवी के रूप में आराधना करते हैं।

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सारंग माता मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित लोककथाओं में मुगल बादशाह अकबर का प्रसंग शामिल है। कहा जाता है कि माता की प्रतिमा पर मदिरा का भोग लगाए जाने की मान्यता सुनकर अकबर इसकी परीक्षा लेने के लिए ऊंटों पर मदिरा लेकर पहाड़ी पर चढ़ा था। लोककथा के अनुसार, हर बार आधी चढ़ाई पर पहुंचते ही ऊंटों पर रखा मदिरा का भंडार खाली हो जाता था। इसे माता का चमत्कार मानते हुए अकबर के झुकने और मंदिर के जीर्णोद्धार करवाने की कथा प्रचलित है। इस प्रसंग को मंदिर की आस्था से जुड़ी किंवदंती के रूप में सुनाया जाता है।

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मंदिर तक पहुंचने वाले रास्ते में माता के पदचिह्न श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखते हैं। मंदिर की मूर्ति पहाड़ी की गुफा में विराजमान है। मान्यता है कि माता रात्रि में सिंह पर सवार होकर भ्रमण करती हैं। मंदिर के परिक्रमा मार्ग में 52 भैरव, 56 कलवा, 64 योगिनी, नौ नृसिंह और पांच पीर क्षेत्रपाल से जुड़े धार्मिक स्थल हैं।

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परिसर में मौजूद करीब 500 वर्ष पुरानी बावड़ी और छतरी इसकी प्राचीन विरासत की पहचान हैं। गुफा के बीच स्थित हनुमान मंदिर भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। यहां हनुमानजी के दर्शन के लिए संकरे रास्ते से लेटकर अंदर जाना पड़ता है। मान्यता है कि इस गुफा में पहले साधु-संत तपस्या किया करते थे।

मंदिर में चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान नौ दिनों तक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। सप्तमी की रात्रि जागरण होता है और सप्तमी से नवमी तक तीन दिवसीय मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष की अष्टमी को जागरण आयोजित किया जाता है। वैशाख शुक्ल षष्ठी से नवमी तक मंदिर का चार दिवसीय पाटोत्सव भी मनाया जाता है।

मंदिर तक पहुंचने वाले मार्ग पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सीढ़ियों को फाइबर शीट से ढका गया है और रेलिंग लगाई गई है। निर्माण सामग्री पहुंचाने के लिए रोपवे ट्रॉली की व्यवस्था है। श्रद्धालुओं के सहयोग से मंदिर परिसर का सौंदर्यीकरण भी किया गया है।

मान्यता है कि सारंग माता करीब 100 गांवों की कुलदेवी हैं। यही वजह है कि राजस्थान के विभिन्न जिलों के अलावा दिल्ली, कोलकाता और आसपास के क्षेत्रों से भी भक्त यहां दर्शन के लिए आते हैं। नवरात्र की अष्टमी और नवमी पर मंदिर में विशेष रौनक रहती है। भक्त हाथों में ध्वजा और छत्र लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं तथा परिवार की सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।

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