महंगाई की मार के बीच मिट्टी के दीयों से रोशन होंगी दीपावली की रातें

दीपावली का पर्व नजदीक आते ही क्षेत्र के कुंभकार परिवारों की व्यस्तता बढ़ गई है। घरों में दीपोत्सव की तैयारियां शुरू होने के साथ ही मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगर भी दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। आधुनिक सजावटी लाइटों और बाजार में उपलब्ध आकर्षक उत्पादों के बीच पारंपरिक मिट्टी के दीयों की मांग बरकरार रहने की उम्मीद ने कारीगरों के चेहरों पर आस जगाई है।

महंगाई की मार के बीच मिट्टी के दीयों से रोशन होंगी दीपावली की रातें
महंगाई की मार के बीच मिट्टी के दीयों से रोशन होंगी दीपावली की रातें

कुंभकार परिवार मिट्टी को आकार देकर दीये और अन्य बर्तन तैयार करने से लेकर उन्हें सुखाने और पकाने तक के काम में जुटे हैं। पारंपरिक भट्ठी यानी आवां में मिट्टी के बर्तनों को पकाने के लिए गोबर के उपलों, सूखी घास और अन्य ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में मेहनत, समय और सावधानी की जरूरत होती है। दीपावली पर मांग को देखते हुए कारीगर समय रहते अधिक से अधिक दीये तैयार करने में लगे हैं।

महंगाई की मार के बीच मिट्टी के दीयों से रोशन होंगी दीपावली की रातें
महंगाई की मार के बीच मिट्टी के दीयों से रोशन होंगी दीपावली की रातें

कारीगरों के अनुसार, महंगाई के कारण मिट्टी और बर्तनों को पकाने में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की लागत बढ़ गई है। इससे दीये तैयार करने का खर्च भी बढ़ा है। इसके बावजूद उन्हें उम्मीद है कि दीपावली पर लोग पारंपरिक मिट्टी के दीये खरीदकर अपने घरों को रोशन करेंगे।

मिट्टी के दीये केवल रोशनी का साधन नहीं, बल्कि हमारी परंपरा और संस्कृति का भी प्रतीक हैं। स्थानीय कारीगरों से दीये खरीदने पर उनकी पुश्तैनी कला को प्रोत्साहन मिलने के साथ ही उनके परिवारों को आर्थिक सहारा भी मिलता है। ऐसे में स्थानीय लोगों से अपील की जा रही है कि वे दीपावली पर मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता देकर स्थानीय कारीगरों की मेहनत का सम्मान करें।

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