हिंदी का वैश्विक परिदृश्य: संदर्भ और चुनौतियां राष्ट्रीय वेबीनार आयोजित

News Chakra@ नीमकाथाना. एस एन के पी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नीमकाथाना (सीकर) के हिंदी विभाग द्वारा “हिंदी का वैश्विक परिदृश्य: संदर्भ और चुनौतियां” विषय पर आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबीनार में बतौर मुख्य अतिथि तथा मुख्य वक्ता राजकीय महाविद्यालय, कोटपूतली के हिंदी विभाग में सहायक आचार्य पद पर पदस्थापित डॉ सत्यवीर सिंह ने कहा कि “आज हिंदी का नीति नियंता केंद्र सरकार का राजभाषा विभाग नहीं बल्कि मीडिया, बाजार , फिल्म उद्योग व विज्ञापन जगत है।

उन्होंने आगे कहा कि हिंदी विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। हिंदी में रोजगार की अनंत संभावनाएं हैं। साथ ही वैश्विक स्तर पर हिंदी के प्रचार और प्रसार के कार्यों को बताते हुए कहा कि आज 150 देशों के 195 से अधिक विश्वविद्यालयों में अध्ययन अध्यापन का कार्य हो रहा है। हिंदी एशिया की ब्रांड में 1 भाषा के रूप में प्रथम स्थान पर काबिज है।

वैश्वीकरण के चलते पूरा विश्व एक बाजार की शक्ल ले चुका है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने उत्पाद का विक्रय जरूरी है और उसमें उत्पाद के विक्रय के लिए अनुकूल भाषा की आवश्यकता होती है। जिसमें भारत में सबसे अधिक अनुकूल भाषा हिंदी है।

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डॉ सत्यवीर सिंह ने हिंदी के अतीत पर दृष्टिपात करते हुए कहा कि हिंदी का एक हजार वर्ष से अधिक का इतिहास है। जिसमें उन्होंने आधुनिक काल का उदाहरण दिया और उसमें सबसे महत्वपूर्ण है भारतीय स्वाधीनता आंदोलन। इस संबंध में वक्तव्य में कहा कि स्वाधीनता आंदोलन में जिन तीन का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है वे हैं- हिंदी, पत्रकारिता और महात्मा गांधी। यदि भारत को आजादी दिलाने में इन तीनों का योगदान बहुत अधिक रहा तो कदाचित अतिशयोक्ति नहीं होगी।

उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा कि महात्मा गांधी ने हिंदी के महत्व को स्वीकार करते हुए 1916 में हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया था। साथ ही गांधी जी ने 1915 में दक्षिण भारतीय हिंदी प्रचार सभा की स्थापना करके यह साबित कर दिया था कि स्वाधीनता आंदोलन के लिए हमें जिस भाषा की आवश्यकता है वह हिंदी ही हो सकती है। अंत डॉ सिंह ने यह भी कहा कि हिंदी के विकास में सर्वाधिक योगदान मीडिया, विज्ञापन, फिल्म, भारतीय सेना, भारतीय रेलवे तथा मातृ शक्ति (महिलाओं) का रहा है।

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  • Vikas Verma

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