राजस्थान में पंचायतीराज और नगरपालिका चुनावों से जुड़े दो से अधिक संतान वाले प्रावधान में बदलाव की संभावनाएं नजर आ रही हैं। कांग्रेस विधायक पूसाराम गोदारा के सवाल के जवाब में राज्य सरकार ने पहली बार लिखित रूप से संकेत दिया है कि इस विषय में संशोधन को लेकर फाइल विधि विभाग में प्रक्रियाधीन है।

दरअसल, पूर्व में पंचायती राज और नगरपालिका कानूनों में संशोधन कर यह प्रावधान किया गया था कि 27 नवंबर 1995 के बाद यदि किसी व्यक्ति की दो से अधिक संतान है, तो वह पंच, सरपंच, उपसरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, प्रधान, जिला प्रमुख, पार्षद, सभापति और मेयर का चुनाव नहीं लड़ सकता। यदि कोई व्यक्ति गलत जानकारी देकर चुनाव लड़ ले और बाद में तथ्य सामने आएं, तो उसका पद समाप्त किया जा सकता है और कानूनी कार्रवाई भी संभव है।
कानून में यह भी स्पष्ट है कि 27 नवंबर 1995 से पहले कितनी भी संतान होने पर यह नियम लागू नहीं होता। यदि पहले एक संतान थी और बाद में जुड़वां बच्चे हुए, तो उसे एक ही इकाई माना जाएगा। यदि तीन बच्चों में से एक को गोद दे दिया जाए, तब भी उसे तीन संतान ही माना जाएगा और अयोग्यता लागू होगी।
यह प्रावधान राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 2009 की धारा 24 तथा राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 1994 में शामिल है, जो तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के कार्यकाल में लागू हुआ था। इसमें यह भी व्यवस्था थी कि चुनाव जीतने के बाद तीसरा बच्चा होने पर जनप्रतिनिधि को पद से हटाया जा सकता है।
सरकार ने अपने जवाब में यह भी स्पष्ट किया है कि निकाय और पंचायत चुनावों में शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य करने का कोई प्रस्ताव वर्तमान में विचाराधीन नहीं है। वहीं, दो से अधिक संतान वाले प्रावधान में संशोधन के लिए विधि विभाग को फाइल भेजी जा चुकी है।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2002 में दो से अधिक संतान होने पर सरकारी नौकरी से जुड़े कड़े नियम भी लागू किए गए थे, जिनमें प्रमोशन रोकने और सेवा से पृथक करने जैसे प्रावधान थे। बाद में 2018 में इन नियमों में आंशिक शिथिलता दी गई थी।
अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विधि विभाग से मंजूरी के बाद सरकार इस नियम में क्या बदलाव करती है, क्योंकि यह मुद्दा पंचायत और निकाय राजनीति से जुड़े हजारों संभावित उम्मीदवारों को सीधे प्रभावित करता है।



