हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी 01 मई को मजदूर दिवस मनाया जाएगा। इस अवसर पर मजदूरों के अधिकारों, उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान की बातें जोर-शोर से उठेंगी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या मेहनतकश वर्ग की समस्याओं पर चिंतन के लिए केवल एक दिन पर्याप्त है?

देश की प्रगति के मूल में यदि किसी वर्ग का सबसे बड़ा योगदान है, तो वह मजदूर और कामगार वर्ग ही है। गगनचुंबी इमारतें, उद्योगों का विस्तार, सड़क और रेल जैसी आधारभूत संरचनाएं—इन सबके पीछे इसी वर्ग का पसीना और परिश्रम छिपा हुआ है। सामाजिक टिप्पणीकार गणेश चौधरी का कहना है कि इसके बावजूद यह वर्ग आज भी अभाव और संघर्ष के बीच जीवन यापन करने को मजबूर है।
इतिहास गवाह है कि मजदूर वर्ग हमेशा उपेक्षित रहा है—चाहे वह राजा-महाराजाओं का दौर हो, अंग्रेजों का शासन हो या फिर स्वतंत्रता के बाद का समय। आजादी के दशकों बाद भी इस वर्ग की जीवनशैली में अपेक्षित सुधार नहीं होना एक गंभीर चिंता का विषय है। महात्मा ज्योतिबा फुले और संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती हमें यह याद दिलाती है कि मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई कितनी लंबी और संघर्षपूर्ण रही है।
डॉ. अंबेडकर ने श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ का गठन किया और कार्य के निश्चित घंटे तथा महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान सुनिश्चित किए। इसके बावजूद आज भी असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों मजदूर बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। उनका वेतन न्यूनतम स्तर पर है और कई स्थानों पर उनका शोषण जारी है।
सरकार द्वारा ई-श्रम पोर्टल जैसे प्रयास जरूर किए गए हैं, लेकिन इन योजनाओं का वास्तविक लाभ अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंच रहा है, यह अभी भी सवाल बना हुआ है। आज जरूरत है कि मजदूरों को केवल नीतियों में ही नहीं, बल्कि व्यवहार में भी सम्मान दिया जाए।
समाज के शिक्षित वर्ग को भी अपनी सोच में बदलाव लाना होगा। जिस मजदूर के श्रम से हमारा जीवन सुगम बनता है, उसी के प्रति उपेक्षा और भेदभाव का रवैया किसी भी सभ्य समाज के लिए उचित नहीं कहा जा सकता। यह समझना आवश्यक है कि हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में श्रमिक है—कोई छोटा तो कोई बड़ा। इसलिए मजदूरों के प्रति दोहरे मापदंड को समाप्त कर उन्हें सम्मानजनक जीवन देने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
मजदूर दिवस केवल एक औपचारिकता न बनकर, वास्तविक परिवर्तन का माध्यम बने—यही समय की मांग है।


